Thursday, April 28, 2016

Birbal ki Aagyakarita - बीरबल की आज्ञाकारिता


एक समय की बात है। बादशाह अकबर किसी बात पर अपने सलाहकार मंत्री बीरबल से रुष्ट हो गए। और गुस्से में आ कर उन्होने बीरबल को राज्य छोड़ कर चले जाने का हुकम दे दिया। और फिर कभी मेरे राज्य में कदम मत रखना यह कह कर बीरबल को राज्य से निकाल दिया।

बीरबल ने बादशाह का हुकुम मानते हुए राज्य का त्याग कर दिया। और चला गया। परंतु कुछ दिनों बाद बीरबल एक बग्गी / घोडा गाड़ी पर बैठ कर अकबर के राज्य की सीमा में देखा जाने लगा।

यह बात एक आग की तरह पूरे नगर में फैल गयी। बादशाह अकबर को इस बात का पता चलते ही उनका दिमाग फिर गया और वह गुस्से से लाल पीले हो गए। बादशाह अकबर तुरंत अपनी सवारी ले कर बीरबल की खोज में निकल पड़े।

बीरबल उस वक्त राज्य की सीमा के अंदर अकबर के उद्यान में अपनी बग्गी / घोड़ागाड़ी पर बैठा बैठा फल खा रहा था। अकबर को गुस्से में आते देख बीरबल ने आदर पूर्वक प्रणाम किए। और कहा की बादशाह ने आने की तकलीफ क्यूँ की? मुजे बुलवा लिया होता।

अकबर ने कहा की मेंने तुम्हें मेरे राज्य में कदम रखने पर मना किया था ना? फिर तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें मेरी सजा का डर नहीं है? क्या तुम जानते हो तुम्हारी इस गुस्ताखी का अंजाम क्या होगा?

बीरबल कहते हैं की मेंने आप के हुकुम की नाफरमानी की ही नहीं है। में तो जब भी आपके राज्य की सीमा में आता हूँ हमेशा बग्गी / घोडा गाड़ी  पर ही रहता हूँ। खाता, पीता, सोता, हर काम इसी पर करता हूँ। मैंने आप के मना करने के बाद  राज्य की सीमा में कदम नीचे रखा ही नहीं है।


बीरबल के इस चतुराई भरे तर्क से अकबर भी हस पड़ते है। और अपना पुराना गुस्सा थूक देते हैं, और बीरबल को दिया हुआ देश निकाला  रद्द करके अपने साथ बीरबल को महल ले जाते है, और  दावत खिलाते हैं।


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