Saturday, September 17, 2016

मासूम गब्बर सिंह और ज़ालिम ठाकुर की दुख भरी कहानी Comedy Story of Gabbar and Thakur -


यह दुख भरी कहानी गब्बर सिंह नाम के एक मासूम डाकू की है। रामगढ़ विस्तार में चोरी डकैती कर के अपना पेट पाल रहे गब्बर सिंह के पीछे सरकारी पगार खाने वाला ठाकुर बलदेव सिंह पड़ जाता है और उसका धंधा चौपट कर के उसकी वाट लगा देता है। गब्बर उसे बार बार बोलता है की भाई,,, मेरे पास सरकारी नौकरी नहीं है,,, खानदानी जायदाद भी नहीं है,,, मुझे शांति से रामगढ़ वालों को लूटने दे,,, मेरी तरक्की देख कर तू क्यूँ जल रहा हैपर ठाकुर बलदेव सिंह से गब्बर की तरक्की देखि नहीं जाती है। और वह उसे मंदिर के जूते चुराने के मामूली जुर्म में जेल करा देता है। गरीब गब्बर जेल मे रह कर तीन पत्ती और मटका खेलने का अमूल्य ज्ञान हासिल करता है।



एक रात गब्बर,,, अपनें नींद में चलने की बीमारी के कारण चल कर गलती से जेल के बाहर चला जाता है। तब रामगढ़ की पुलिस मासूम गब्बर पर जेल तोड़ कर भागने का इल्ज़ाम लगा देती है। खुद जेल के दरवाज़े खुले रख कर भूल जाने वाली रामगढ़ की खुखार पुलिस गब्बर को भूखे भेड़ियों की तरह ढूँढने लगती है।

लाचार गब्बर छुपते छुपाते उसी ठाकुर बलदेव सिंह के पास जाता है जिसने उसे जेल में भेजा था। गब्बर को देख कर ठाकुर बलदेव सिंह गुस्से से लाल पीला हो जाता है। और गब्बर को वहीं घूसों और लातों से धोने लगता है। अबला नर गब्बर फिर एक बार बे-वजह मुसीबत में फस जाता है।
गब्बर को गोली मार देने के लिए,,, ठाकुर बलदेव सिंह अपनी बंदूक लाने घर के अंदर भागता है,,, तभी अचानक उसका पैर केले के छिलके पर फिसल जाता है। गिर जाने से ठाकुर बलदेव सिंह का एक हाथ टूट जाता है।

मार खानें के बाद भी भावुक गब्बर उस ज़ालिम बलदेव सिंह की मदद को दौड़ आता है। गब्बर उसे उठा कर बिस्तर पर सुला देता है। तभी अचानक ठाकुर बलदेव सिंह के दूसरे हाथ पर चलता हुआ पंखा (selling fan) गिर जाता है। और उसका दूसरा हाथ भी बेकार हो जाता है।



भगवान नें गरीब चोर गब्बर को सताने वाले ज़ालिम ठाकुर को उसके कर्मो की सज़ा दे दी।

ठाकुर नें गब्बर को कहा की,,, अब तो मेरे हाथ वैसे भी बेकार हो चुके हैं,,, इस लिए एक काम कर इन्हे तलवार से काट कर अलग कर दे।       

भोला गब्बर ठाकुर के कहे अनुसार उस के हाथ काट कर मदद कर देता है। तभी अचानक एहसान फरामोश ठाकुर बलद्व सिंह चिल्ला चिल्ला कर लोगों को बुला लता है। और कहता है की गब्बर नें मुझ पर हमला कर के मेरे हाथ काट दिये।

गब्बर समझ नहीं पता है की बलदेव सिंह उसके साथ ऐसा सुलूक क्यूँ कर रहा है। जमा हुए लोग मिल कर गब्बर को पकड़े उसके पहले ही, गब्बर वहाँ से भाग निकलता है। और पहाड़ियों में जा छिपता है।

हाथ कटा टुंडा ठाकुर बलदेव सिंह अब भी गब्बर को पकड़ने के सपने देख रहा होता है। वह बिरजू मोची के पास जा कर कील वाले जूते सिलवा लेता है। और फिर जय और वीरू नाम के दो कुख्यात गुंडों को हायर कर लेता है। (बुला लेता है)। 


गाँव में आते ही वीरू एक तांगे वाली के चक्कर में पड़ जाता है। और जय ठाकुर बलदेवसिंह की बहू (बेटे की बीवी) पे डोरे डालने लगता है। यह सब देख कर ठाकुर बलदेव सिंह को काफी गुस्सा आता है। जैसे तैसे कर के,,, मोगली की कहानिया सुना कर जय और वीरू बलदेव सिंह को शांत कर लेते हैं। और गब्बर को ढूँढने के काम पर लग जाते हैं।

एक दिन पहाड़ियों में बसे गब्बर के पास राशन खतम हो जाता है,,, तब वह अपने कुछ कर्मचारी डाकू गाँव में भेजता है,,, ताकि शांति से कुछ अनाज लूट कर गुज़र बसर की जा सके।

ठाकुर के पाले हुए गुंडे जय और वीरू तब वहाँ  बिछ में कूद पड़ते हैं और गब्बर के कर्मचारियों को गाँव से अनाज ले जाने नहीं देते हैं। गब्बर का एक आदमी कालिया जय और वीरू के पाँव पकड़ कर मिन्नते करता है की भाई,,, बहुत गरीबी है,,, पेट खाली है,,, नौकरी धंधा भी नहीं है और हमें तो सरकार से आरक्षण भी नहीं मिलता। इस लिए हमें शांति पूर्वक लूट करने दो,,, तुम्हें भगवान का वास्ता।

  


जय और वीरू उन गरीब मासूम डाकूओं की बात नहीं मानते हैं और उन्हे मार-मार कर वापिस भेज देते हैं। गब्बर जब अपनें अधमरे साथियों की हालत देखता है तो वह फुट फुट कर रो पड़ता है। मासूम डाकुओं की जमात अपनें सरदार को यू रोता देख कर सदमें में आ जाती है।

फिर गब्बर अपनें प्रिय सेवक कालिया से पूछता है की,,, कितने आदमी थे,,, तब कालिया जवाब देता है की,,,  तू खुद जा कर गिन ले,,, नहीं बताता जा... इस बात पर शांत स्वभाव का सरद्दार गब्बर कहेता है की... बेटा कालिया इस तरह बड़ों से बात नहीं करते।



तभी गब्बर को याद आता है की कई दिनों से उसने अपनी बंदूक साफ नहीं की है। वह बिचारा अपनी gun साफ करने के लिए कवर से निकालता है,,, तभी अचानक उसमें से तीन गोलियां चल जाती हैं और दुर्घटना वश कालिया और उसके साथ खड़े दो डाकू मारे जाते हैं।

इस दुखद प्रसंग से आहत हो कर गब्बर एक हफ्ते तक खाना नहीं खाता है और नहाता भी नहीं है। फिर गब्बर जब शोक से बाहर आता है तब बड़े पत्थर पर बैठ कर candy crash खेल रहे अपनें एक सह डाकू सांभा से पूछता है की मित्र सांभा होली कब हे,,,

सांभा जवाब देने की वजाय अपना गोबर सना जूता उतार कर गब्बर के सिर पर दे मारता है। गब्बर अपनें junior की इस असभ्य हरकत से काफी दुखी होता है। गब्बर फिर एक बार पूछता है की सांभा तेरे पास फोन है तो calendar देख कर होली की तारीख बता दे please,,,

अंत में सांभा मुझ फुलाते हुए होली की तारीख बता देता है। गब्बर फिर अपनें सभी साथियों से कहता है की होली के दिन हम सब ठाकुर बलदेव सिंह के पास जा कर समाधान कर आएंगे। ताकि बरसों से चला आ रहा बैर मीट जाए। और फिर सभी डाकू बे सबरी से होली का इंतज़ार करने लगते हैं।




होली के दिन जैसे ही गब्बर अपने सह डाकू गण को साथ ले कर रामगढ़ आता है,,, तब जय उस पर टूट पड़ता है। बाल्टी, डिब्बा, पत्थर, जाडू जो हाथ लगा उस से बिचारे डाकुओं को मारने लगता है। गब्बर कहता है की भाई हम होली के पावन अवसर पर समाधान करने आए हैं तू लड़ मत हमसे। पर जय रुकता नहीं है।

राम गढ़ के चौक में खलबालि मची देख कर वहाँ खड़ा हुआ एक अलबेला सांढ उत्साहित हो जाता है और दौड़ कर उधम मचा रहे गुंडे जय को अपनें सींगों ठोक देता है। तभी वहीं घायल हो कर जय की मृत्यु हो जाती है। गब्बर और उसके आदमी सोचते हैं की इस जय की मौत का इल्ज़ाम भी उनही पर लगाया जाएगा। इस लिए वह सब उल्टे पाँव फिर से पहाड़ियों में अपने ठिकाने की और लौट जाते हैं। गब्बर भगवान को याद करते हुए कहता है की हे भगवान मैंने क्या पाप किए हैं जो मुझे इतनी तकलीफ़ें दे रहा है।


यहाँ जय की मौत पर वीरू पागल सा हो जाता है। और ठाकुर भी अपनें नुकीले जूते पहेन कर गब्बर से राड़ा करने को तैयार हो जाता है।


इस बार वीरू और ठाकुर बलदेवसिंह सीधे गब्बर के ठिकाने पर आ चड्ते हैं। दोस्ती की मौत के सदमें में सटका हुआ वीरू एक एक मासूम डाकू को कोहनीय मार मार कर मार डालता है। अंत में जब गब्बर को मारने जाता है तो बिछ में टुंडा ठाकुर बलदेवसिंह आ जाता है।


वीरू और ठाकुर दोनों गब्बर को मारने के लिए,,, पानी के नल पर जगड़ रही औरतों की तरह एक दूजे से गाली गलोच करने लगते हैं। अंत में दोनों एक सिक्के से टॉस उछाल कर फ़ैसला कर लेते हैं की गब्बर को कौन मारेगा। टॉस का फ़ैसला ज़ालिम ठाकुर के पक्ष में आता है।


और फिर हथ-कटा ठाकुर बलदेव सिंह वहेशी दरिंदों की तरह,,, कील वाले जूतों से पीट पीट कर गब्बर को मार देता है।


कहानी के अंत में वीरू गाँव की सब से कम दिमाग और बड़बड़ करने वाली बसंती को भगा कर शादी कर लेता है। और ठाकुर बलदेव सिंह गाँव में ही रह कर मटर-गश्ती कर के जिंदगी बीतता है। ठाकुर बलदेव सिंह का नौकर रामलाल आजीवन कुवारा रह कर ठाकुर के खाने-पीने नहाने और धोने की ज़िम्मेदारी उठा लेता है। येही है मासूम गब्बर की दुख भरी कहानी। - Just for Laugh     

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